मेरे तारे
देख रही थी तारे
जाने कितने - कितने सारे
छोटी थी , तो गिनती थी
ढेरों सपने बुनती थी
'सप्तऋषि', 'ध्रुव' ढूँढती थी
अनोखी आकृतियों पे हसती थी
अक्सर देखा करती तारे
जाने कितने कितने सारे
बीता बचपन,बदले सपने
बदला ढंग,देखने का,तारे
लगता था,है मुझमे,ग्यान बहुत
हर बहस जीत खुश होती थी
अक्सर देखा करती तारे
अब,दूर बहुत,लगते तारे
कुछ बदल गया,कुछ बीत गया
कुछ बिखरे,कुछ टूटे तारे
अनजान भविश्य,अजनबी डगर
पर फिर विश्वास,साहस संजोती थी
लगता तारे, होते हैं तारे
बस दूर से अच्छे हैं सारे
अब और भले से लगते हैं
जब 'तारों' को दिखलाती हूँ तारे
वो पूछते हैं 'ध्रुव है कैसा?'
उन्हें सप्तऋषि लगते प्यारे
बाहें फैला के कहते हैं
' मैय्या देखो.......देखो कितने तारे......'
बैठी देख रही हूँ तारेकितने प्यारे..............'मेरे तारे'
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