“एक महान उद्देश्य लेकर मर जा. मर तो जाएगा ही,
पर महान उद्देश्य लेकर मरना ठीक है. तुम्हें कर्म विहीन
देखकर मुझे कॅस्ट होता है. लग जा, काम में लग जा .
विलंब ना कर—मृत्यु तो दिनों दिन निकट आ रही है .
यदि तू बैठा रहेगा तो तुझसे कुछ भी ना हो सकेगा”.
“जितनी शक्ति है पहले उतना ही कार्य कर. धन के अभाव में
यदि कुछ नहीं दे सकता तो ना सही, पर एक मीठी बात या
ADVICE तो उन्हें दे सकता है.
क्या इसमें भी धन की आवशयकता है?”
“तपस्या जैसी कठिन है , निस्काम कर्म भी वैसा ही कठिन है.Therefore,औरों के मंगल के निमित्त जो लोग कर्म करते हैं उनके विरुध कुच्छ कहने का तुझे क्या अधिकार है ?
यदि तुझे तपस्या अच्छि लगे तो कियए जा,.परंतु किसी को कर्म ही अच्छै लगे तोउसे रोकने का तुझे क्या अधिकार है? तू क्या यही समझे बैठा है की कर्म तपस्या नहीं है?”
--स्वामी विवेकानंद
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पेर्ंालिंक